पलायन की काली साया: SSB जवानों ने कंधा देकर बचाई बुजुर्ग की अंतिम यात्रा की गरिमा – पर्वतजन

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड): उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन की समस्या ने गांवों को इतना खोखला कर दिया है कि अब मृतकों की अंतिम यात्रा तक के लिए सक्षम लोग नहीं मिल रहे। इसकी एक हृदयविदारक मिसाल जिले के नेपाल सीमा से लगे तड़ीगांव में सामने आई, जहां एक शतायु महिला के निधन के बाद शव को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए युवा नहीं थे। अंततः सशस्त्र सीमा बल (SSB) के जवानों ने मानवीयता का परिचय देते हुए यह जिम्मेदारी संभाली।
 
नेपाल बॉर्डर के निकट स्थित तड़ीगांव में रहने वाली लगभग 100 वर्षीय झूपा देवी का 31 दिसंबर 2025 को देहांत हो गया। शव को अंत्येष्टि स्थल तक पहुंचाने के लिए गांव से काली नदी के किनारे करीब 2.5 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी। जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर इस गांव में केवल वृद्धजन ही बचे हैं। गांव के पूर्व प्रधान भूपेंद्र चंद ने बताया कि शव यात्रा के लिए मात्र चार-पांच व्यक्ति उपलब्ध थे, जो सभी बुजुर्ग थे और शारीरिक रूप से असमर्थ।

 
ऐसे में ग्रामीणों ने नेपाल सीमा पर तैनात SSB जवानों से सहायता मांगी। जवानों ने तुरंत प्रतिसाद देते हुए दो अधिकारी और चार जवान भेजे। उन्होंने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ियां भी जुटाईं और पूरी रस्में संपन्न कराईं। 65 वर्षीय पुत्र रमेश चंद ने मां की चिता को मुखाग्नि दी।
 
यह घटना उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पलायन के गंभीर संकट को उजागर करती है। तड़ीगांव में सड़क निर्माण की देरी, जंगली सूअरों से फसलों का नुकसान तथा गुलदार व भालू के खतरे जैसे कारणों से प्रवास बढ़ा है। 20 वर्ष पूर्व जहां 37 परिवार निवास करते थे, वहीं अब केवल 13 परिवार शेष हैं, जिनमें मुख्यतः वृद्ध और बच्चे हैं।

सरकार ने पलायन रोकने के लिए आयोग गठित कर विभिन्न योजनाएं संचालित की हैं, किंतु जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अन्य गांवों में भी ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। SSB जवानों की इस सहायता ने जहां मानवता की मिसाल कायम की, वहीं पलायन की समस्या पर पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित किया।

Sapna Rani

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