उत्तराखंड के हिमालयी जंगलों में इको-टूरिज्म के नाम पर हो रही लूट अब एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आ रही है। राज्य सूचना आयोग (USIC) के जनवरी 2026 के एक आदेश ने न केवल वन विभाग की लापरवाही को उजागर किया, बल्कि मुन्स्यारी, पिथौरागढ़ के खलिया रिजर्व फॉरेस्ट में अनधिकृत निर्माणों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जांच से पता चला कि यह एक संगठित भ्रष्टाचार की कहानी है।
भ्रष्टाचार के संगीन आरोप और ‘इको-टूरिज्म’ का विवाद
इस विवाद की जड़ें पिथौरागढ़ के मुनस्यारी में हुए निर्माण कार्यों में निहित हैं। अपीलकर्ता श्री हरिन्दर धींगरा ने भारतीय वन सेवा (IFS) के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी श्री विनय कुमार भार्गव के विरुद्ध भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में जानकारी मांगी थी।
● मामले की गंभीरता: आरोपों के अनुसार, मुनस्यारी में ‘इको-हट्स’ के निर्माण के दौरान वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 2 और 3 का खुला उल्लंघन किया गया।
● अवैध निर्माण: स्रोत सामग्री स्पष्ट करती है कि इको-टूरिज्म सुविधाओं के नाम पर वहां “permanent cement, brick and mortar structures” (पक्के सीमेंट, ईंट और गारे के ढांचे) खड़े कर दिए गए, यहाँ न केवल सार्वजनिक धन का प्रश्न है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के कड़े कानूनों की अनदेखी का भी गंभीर मामला है।
घोटाले की शुरुआत: इको-हट्स के नाम पर जंगल की लूट
मुन्स्यारी क्षेत्र, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए जाना जाता है, 2019 से विवादों में घिरा है। यहां खलिया रिजर्व फॉरेस्ट में करीब 10 VIP इको-हट्स, एक डॉरमेटरी, सेल्स सेंटर और ग्रोथ सेंटर का निर्माण हुआ, जिसमें सीमेंट और ईंट जैसी स्थायी सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 और 3 के अनुसार, ऐसे निर्माणों के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति जरूरी है, लेकिन बिना अनुमति के काम शुरू हो गया। यह निर्माण तत्कालीन DFO डॉ. विनय कुमार भार्गव के कार्यकाल में हुआ, जिन पर आरोप है कि उन्होंने नियमों की अनदेखी की।
जांच से पता चला कि ये हट्स इको-टूरिज्म के बहाने बने, लेकिन वास्तव में पर्यटन राजस्व का 70% हिस्सा मुन्स्यारी इको विकास समिति नामक एक निजी सोसाइटी को ट्रांसफर किया गया, जो MoU साइन होने के बाद ही रजिस्टर्ड हुई। कुल अनियमितता ₹1.63 करोड़ की बताई जा रही है, जिसमें टेंडर बिना कॉन्ट्रैक्ट दिए गए और फर्जी बिलिंग का शक है। यह मामला कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के अवैध निर्माणों से मिलता-जुलता है, जहां भी सरकारी मिलीभगत के आरोप लगे थे।
‘व्यक्तिगत जानकारी’ (Personal Information) का कानूनी ढाल
अपीलकर्ता ने अधिकारी के खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही की पूरी फाइल, नोटिंग और पत्राचार की मांग की थी। हालांकि, विभाग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत इसे ‘व्यक्तिगत जानकारी’ बताते हुए देने से इनकार कर दिया था ।
भले ही आयोग ने पूरी फाइल देने की अनुमति नहीं दी, लेकिन उसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक ‘मध्यम मार्ग’ निकाला है।आयोग ने स्पष्ट रूप से दो-स्तरीय समय-सीमा (Timeline) निर्धारित की है:
● पूर्ण हो चुकी जांच के लिए: आदेश में निर्देशित किया गया है कि जिन प्रकरणों में जांच पूर्ण हो चुकी है, उनका ‘व्यापक निष्कर्ष’ (Broad Outcome) आयोग के आदेश प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर अपीलकर्ता को अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराया जाए।
● जारी जांच के लिए: जिन मामलों में जांच अभी गतिमान है, वहां जांच पूर्ण होने की तिथि से 15 दिनों के भीतर अपीलकर्ता को ‘Broad Outcome’ देना सुनिश्चित किया जाए।यह व्यवस्था अधिकारी की निजता की रक्षा भी करती है और जनता के इस हक को भी बरकरार रखती है कि वह जान सके कि दोषी को सजा मिली या उसे क्लीन चिट दी गई।
सरकारी कार्रवाई: नोटिस से आगे कुछ नहीं
उत्तराखंड सरकार ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के “जीरो टॉलरेंस” दावों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया। केंद्र ने अगस्त 2025 में राज्य को उल्लंघन रिपोर्ट और ATR मांगा, साथ ही दोषियों पर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। लेकिन 8 महीनों में कोई प्रगति नहीं। भार्गव ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर कर नोटिस रद्द करने की मांग की, दावा किया कि अनुमतियां थीं और प्रक्रिया का पालन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की दखल: राज्य की लापरवाही पर सवाल
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार से पूरे राज्य में अवैध निर्माणों पर रिपोर्ट मांगी, “स्थायी लापरवाही” और “मिलीभगत” का आरोप लगाते हुए। कोर्ट ने वन भूमि पर अतिक्रमण को “चौंकाने वाली विफलता” बताया, और कार्यवाही का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव किया। यह मुन्स्यारी मामले से जुड़ा है, जो राज्यव्यापी समस्या का हिस्सा है।
यह जांच दर्शाती है कि सरकारी इच्छाशक्ति की कमी सब बर्बाद कर देती है।
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