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उत्तराखंड के इन शहरों में जाना खतरे से कम नहीं, ले ली सांस तो कैंसर का बढ़ेगा खतरा, टूरिज्म बना जी का जंजाल – myuttarakhandnews.com

नैनीतालः उत्तराखंड में धार्मिक पर्यटन का तेजी से विस्तार हुआ है. लाखों पर्यटक साल भर देव स्थलों पर पहुंच रहे हैं. लेकिन यही पर्यटन पहाड़ के पर्यावरण पर भारी पड़ने लगा है. नैनीताल का कैंचीधाम हो या फिर बद्रीनाथ यहां प्रदूषण का लेवल कई गुना बढ़ने लगा है, जिससे हवा पानी खराब हो रही है. हालात इस कदर बिगड़ रहे हैं कि स्थानीय व पर्यटक सब को स्लो प्वाइजन इन इलाकों में मिल रहा है. पहाड़ों के धार्मिक पर्यटन में वाहनों का ये दबाव पर्यावरण पर भारी पड़ने लगा है. स्वास्थ्य लाभ के लिये पहुंच रहे भक्तों पर सीधा असर पड़ने लगा है.
कैंचीधाम-बद्रीनाथ से ज्यादा सेफ अल्मोड़ापिछले कुछ सालों से कैंचीधाम से लेकर बद्रीनाथ तक वाहनों के प्रेशर से प्रदूषण का लेवल हाई हो गया है. नैनीताल एरिज के वैज्ञानिकों के शोध में सामने आया है कि कैंचीधाम में नान मीथेन हाईड्रोकॉर्बन का स्तर 50 पीपीबी तक पहुंच गया है तो बद्रीनाथ के कार पार्किंग में लिये सेंपल में 40 से 45 पीपीबी तक प्रदूषण लेवल मिला है. जबकि हल्द्वानी और अल्मोड़ा में 25 से 30 लेवल को टच किया है. प्रदूषण के मामले में कैंचीधाम, बद्रीनाथ से ज्यादा सुरक्षित अल्मोड़ा व हल्द्वानी है. जबकि नैनीताल की आबोहवा सबसे बेहतरीन है. यहां प्रदूषण का लेवल 5 से 15 तक ही है. लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के लेवल के बाद ये चिंता भी देने लगा है.
गाड़ियों ने खराब की आबोहवादरअसल कैंचीधाम व बद्रीनाथ में नॉन मीथेन हाईड्रोकाँर्बन बढ़ने का सबसे बड़ा जरिया गाड़ियों की भीड़ और उससे निकलने वाला धुआं है. तेजी से बड़े वाहनों के प्रेशर से आबोहवा खराब होने के साथ इसका असर पानी, हवा, पर्यावरण व यहां की जैव विविधता पर सीधे तौर पर पड़ा है. एरीज द्वारा हिमालयी क्षेत्रों के लिये कैंपेन में ये सब कुछ सामने आया है. तो साल दर साल इन इलाकों में बढ़ रहे वाहनों की भीड़ को कम करने का कोई प्लान लागू ही नहीं हो सका है. तेजी से बढ़ रहे इस स्लो प्वाइजन सांस से लेकर कैंसर तक की बीमारी दे सकता है .हांलाकि अधिकारी कहते हैं कि वाहनों के दबाव को कम करने के लिये प्लानिंग की जा रही है.
समय रहते करना होगा कुछबहरहाल एरीज नैनीताल के शोध में जो कुछ सामने आया है, वो अभी शुरुआत है. अगर सरकार ने इन इलाकों में वाहनों की आवाजाही कम नहीं की तो ये प्रदूषण का लेवल आने वाले सालों में कई गुना बढ़ सकता है. जरुरी होगा कि इन सब को अलार्म माना जाए और ठोस कदम उठाए जाएं ताकि पहाड़ जिस आबोहवा के लिये जाने जाते हैं उसको बचाया जा सके.

Nandni sharma

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