ज्ञान के तेजमण्डल से आलोकित – श्री श्री स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी – मंजुलता – my uttarakhand news

 
 
“श्रीयुक्तेश्वरजी के पवित्र चरणों का स्पर्श करते समय मैं सदा ही रोमांचित हो उठता था।…उनकी ओर से एक सूक्ष्म विद्युत धारा प्रवाहित होती थी।…मैं जब भी अपने गुरु के चरणों पर माथा टेकता था, मेरा सम्पूर्ण शरीर जैसे एक मुक्तिप्रदायक तेज से भर जाता था।” प्रस्तुत पंक्तियाँ परमहंस योगानन्दजी ने अपने विशाल लेखन-कार्य की श्रृंखला में उनकी सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध पुस्तक “योगी कथामृत,” जो एक महान् गौरव ग्रंथ के रूप में पिछले 80 से भी अधिक वर्षों से कोटि-कोटि लोगों के जीवन को बदलने में अपनी भूमिका निभा रही है, में अपने श्रद्धेय गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी के विषय में लिखी थीं।
 
 
इन महान् संत का जन्म श्रीरामपुर, कोलकाता में 10 मई 1855 को एक धनवान व्यापारी परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम प्रियनाथ कड़ार था। स्कूली पढ़ाई इन्हें बहुत उथली और धीमी प्रतीत होती थी। इन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश तो अवश्य किया किन्तु शीघ्र ही पत्नी के देहांत के पश्चात संन्यास ग्रहण कर श्रीयुक्तेश्वर कहलाए।
 
 
अपने शिष्य मुकुन्द को, अपने ही समान एक ईश्वर प्राप्त जगद्गुरु में परिवर्तित करने हेतु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने उन्हें 10 वर्ष का गहन प्रशिक्षण प्रदान कर हम सब पर एक महान् उपकार किया है। उनके आदेश पर ही उनसे प्राप्त मुक्तिदायक सत्यों के प्रसार के उद्देश्य से योगानन्दजी ने पूर्व में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया तथा पश्चिम में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की जहाँ पर ईश्वरप्रेमी भक्त अपना नामांकन कर गृह-अध्ययन पाठमाला के माध्यम से ध्यान की मुक्तिदायिनी उच्चतम प्रविधि, क्रियायोग, सीखते हैं। अधिक जानकारी yssi.org से प्राप्त की जा सकती है।
 
 
स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का अन्तर्ज्ञान अंतर्भेदी था। वे अपने शिष्यों व आश्रम में आने वालों के विचारों को पढना भी जानते थे किन्तु उन्होंने अपनी इस दिव्य शक्ति का प्रयोग उनके विचारों की स्वतन्त्रता का अतिक्रमण करने के लिए कदापि नहीं किया। योगानन्द जी बताते हैं कि एक बार श्रीयुक्तेश्वरजी अपने शिष्यों को प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन के बीच में ही वे बोल उठे, “तुम यहाँ नहीं हो।”
 
 
योगानन्दजी ने विरोध करते हुए कहा, “गुरुजी! मैं जरा भी नहीं हिला; मेरी पलकें भी नहीं हिलीं; आपने जो-जो अभी कहा है, मैं एक-एक शब्द दोहरा सकता हूँ!”
 
 
श्रीयुक्तेश्वरजी बोले, “फिर भी पूर्ण रूप से तुम मेरे साथ नहीं थे।…तुम अपने मन की पृष्ठभूमि में तीन संस्थाओं का निर्माण कर रहे थे। एक थी मैदानी क्षेत्र में एकांत आश्रम, दूसरी एक पहाड़ी के शिखर पर और तीसरी एक समुद्र तट पर।” योगानन्दजी ने स्वीकार किया कि वे असपष्ट विचार लगभग अवचेतन स्तर पर उनके मन में चल रहे थे। ये विचार आगे चलकर सत्य सिद्ध हुए। (पूर्ण विवरण हेतु कृपया योगी कथामृत देखें)
 
 
चेतना की इतनी उन्नत अवस्था में होते हुए भी वे अपने दृष्टिकोण में अत्यंत व्यावहारिक थे। रोगी हो जाने पर अपने शिष्यों को डॉक्टर के पास जाने के लिए कहते थे यद्यपि उनके पास रोग-निवारक शक्तियों का भंडार था। वे कहते, “डॉक्टरों को भौतिक पदार्थों के लिए निर्धारित ईश्वरीय नियमों के अनुसार अपना चिकित्सा-कार्य करना चाहिए।” श्रीयुक्तेश्वरजी कहते थे, “जिन्होने शरीर-विज्ञान का अध्ययन किया है उन्हें आगे चलकर आत्म-विज्ञान का अनुसन्धान करना चाहिए। शरीर की यन्त्रावली के पीछे एक सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना छिपी हुई है।” परन्तु मानसिक शक्ति के द्वारा रोग-निवारण को वे अधिक श्रेष्ठ मानते थे। वे प्रायः कहते थे, “ज्ञान ही सबसे बड़ा परिमार्जक है।”
 
ज्ञानवतार के रूप में प्रख्यात इन संत को, जो प्रत्यक्ष संसार में रहते हुए भी आत्मा की निर्जन कन्दरा में वास करते हुए सदा ईश्वर के साथ एक रहते थे, उनके आविर्भाव दिवस के अवसर पर नमन् करते हुए आइए उनके अदृश्य आशीर्वादों के भागी बनें।
 
 
 
 

pooja Singh

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