देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र लैंसडाउन, देहरादून में रविवार को अमित श्रीवास्तव की किताब कोविड ब्लूज पर अनौपचारिक चर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा में कई वरिष्ठ साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने उत्साह से भाग लिया। चर्चा की शुरुआत करते हुए संचालक डॉ नितिन उपाध्याय ने किताब का संक्षेप के परिचय दिया और लेखक से इस किताब विशेष की रचना प्रक्रिया के बारे में जानना चाहा। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और हिन्दी के स्थापित लेखक अमित ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि यह पुस्तक सिर्फ प्रारंभ में सिर्फ लिखी गई थी इसके रूप स्वरूप या इस रूप में आने की पूर्व में कोई कल्पना नहीं की गई थी। यह यातना के दिनों में डायरी के रूप में और फेसबुक पर लिखे इंदराज मात्र हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक पांडे से इस किताब की प्रासंगिता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि इतिहास के तेरहवीं सती में लिखे गए इंग्लैंड में आए प्लेग पर लिखे गए डेकामरान और एल्बेर कामू को छोड़ दिया जाय तो किसी महामारी को लेकर इस तरह कम ही लिखा गया है।
इस अनौपचारिक चर्चा में लेखकों और सुधि पाठकों ने भी गंभीर हस्तक्षेप किए।लखनऊ से आए डॉक्टर तुषार ने बताया कि यह किताब हमें उस दौर की अफरातफरी ,डर और मनोदशा को बड़ी शिद्दत से रेखांकित करती है। दिल्ली से पधारे युवा साहित्यकार मनोज पांडेय ने किताब को महामारी के दौरान मनुष्य के व्यवहार और सामाजिक मनोविज्ञान का आइना बताते हुए कहा कि यह किताब हमारी सामूहिक चेतना का विसरा सुरक्षित रख लिया है और आने वाले समय में जब हम इस दौर की शिनाख्त करने चलेंगे को उस दिशा में यह किताब संदर्भ विंदु होगी। यह किताब भूल कर आगे बढ जाने पर चोट करती है। कोविड काल पर लिखी एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक पुद्दन कथा के लेखक देवेश ने किताब की विषयवस्तु पर गंभीर चर्चा कि किताब के कई अंशों का पाठ किया।
गाजियाबाद से आए वरिष्ठ कवि राहुल द्विवेदी ने किताब की विषय वस्तु और शिल्प पर चर्चा करते हुए बताया कि यह किताब कोविड के दौरान दिवंगत हुए लोगों के प्रति एक तरह की श्रद्धांजलि है। किताब के शिल्प और विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए डॉक्टर सुशील उपाध्याय ने बताया कि कोविड ने भाषा के स्तर पर लगभग छः सौ शब्दों का योगदान दिया है और अमित की किताब कोविड पर इतने व्यापक ढंग से चर्चा करती है कि सुखद आश्चर्य की तरह वे सभी शब्द किताब में मिल जाते हैं।
वरिष्ठ आईएएस रणवीर सिंह चौहान ने अपनी शायराना अंदाज में कुछ ही समय में अमित के समूचे रचनाकर्म पर अर्थवान टिप्पणी की और उन्हें यूं ही लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं दी। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और लेखक ललित मोहन रयाल ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि अमित विधाओं के बीच सतत , सहज और सजग आवाजाही के रचनाकार हैं। वे अपनी हर रचना में पाठकों के लिए चुनौती और अवसर लेकर आते हैं।
नोएडा से पधारे वरिष्ठ टिप्पणीकार और साहित्य मनोविज्ञान के गहरे जानकार रजनीकांत पांडे ने कोविड के दौरान पेश आई मुश्किलों और किताब में दर्ज घटनाओं को उद्धृत करते हुए उस भयावह दौर को याद किया और साथ इस बात पर हार्दिक संतोष भी व्यक्त किया कि एक जिम्मेदार लेखक के तौर पर अमित जी ने इस दौर की त्रासदी को अगली पीढ़ी को सजग करने और उसके प्रति तैयार रहने का प्रस्थान बिंदु दिया है।
यशस्वी कथाकार श्रीकांत ने किताब में आई मार्मिक कहानियों का उल्लेख करते हुए बताया कि ये कहानियां मर्म स्पर्शी हैं और उनका साहित्यिक मूल्य असंदिग्ध है लेकिन वे ऐसे काले दौर में ले जाती हैं जिसमें कोई वापस नहीं जाना चाहेगा। इस चर्चा में डॉक्टर सविता मोहन,गंभीर सिंह पलनी,डॉ सुधा रानी पांडे ,रूचिता तिवारी ,नवीन नैथानी आदि ने सार्थक हस्तक्षेप किया और अमित को शानदार किताब के लिए बधाई दी।
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