सच की कीमत: पुरोला में भ्रष्टाचार उजागर करना पत्रकारों के लिए क्यों बनता जा रहा है खतरे का सौदा? – Parvatjan

रिपोर्ट – दीपेंद्र कलूडा 

सच की कीमत: पुरोला में भ्रष्टाचार उजागर करना पत्रकारों के लिए क्यों बनता जा रहा है खतरे का सौदा?
खबर दिखाने की सजा—धमकियां, दबाव और सिस्टम की चुप्पी के बीच संघर्ष करती पत्रकारिता

उत्तरकाशी जनपद की पुरोला विधानसभा, जहां विकास के दावे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, वहीं दूसरी ओर सच उजागर करने वाले पत्रकारों के लिए हालात लगातार कठिन होते जा रहे हैं।

यह कहानी सिर्फ कुछ खबरों की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जो हर उस पत्रकार के हिस्से में आता है, जो सच्चाई को सामने लाने की हिम्मत करता है।
वाकया 18 मार्च का है, जब कई समाचार पत्रों—शाह टाइम्स, दैनिक प्रधान टाइम्स, नवोदय टाइम्स—और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे पहाड़ संदेश न्यूज, हिमवंत टाइम्स और गढ़ देश न्यूज पर सिंचाई विभाग और लघु सिंचाई विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर खबरें प्रकाशित की गईं।
इन खबरों में ठोस तथ्यों और जमीनी पड़ताल के आधार पर यह दिखाया गया कि किस प्रकार लाखों रुपये की योजनाएं मिट्टी से व नदियों में पूरी दिखाकर जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
इन खबरों का असर भी हुआ। संबंधित विभागों ने संज्ञान लिया और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की। लेकिन यही वह मोड़ था, जहां से पत्रकारों के लिए मुश्किलों की शुरुआत हो गई।
भ्रष्टाचार का सच सामने आने के बाद कुछ ठेकेदारों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को यह नागवार गुजरा। सवाल उठने लगे, दबाव बनने लगा और धीरे-धीरे यह दबाव खुली धमकियों में बदल गया।
20 मार्च को एक तथाकथित ठेकेदार संगठन के अध्यक्ष बद्री प्रसाद द्वारा तीन पत्रकारों को अपने कार्यालय (या यूं कहें दुकान) पर बुलाया गया। हालांकि वहां केवल दो पत्रकार—दीपेन्द्र सिंह कलूडा और शैलेन्द्र भंडारी—ही पहुंचे।
जो बातचीत वहां हुई, वह केवल एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा हमला थी। कथित अध्यक्ष ने साफ शब्दों में कहा—“ठेकेदार विभिन्न जगहों पर कमीशन देकर काम लाता है इसलिए ठेकेदारों की खबरें दिखाना बंद करो।”
इतना ही नहीं, उसने यह भी दावा किया कि “खबरें पहले उसे दिखानी होंगी, और अगर वह चाहे तो खबरों को मैनेज कर सकता है।”यह बयान सिर्फ एक व्यक्ति की सोच नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो सच को दबाने और सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
21 मार्च को एक और खबर सामने आई। पत्रकार अरविंद जयाड़ा ने गुंडियाटगांव के पास एक नाले में सिंचाई विभाग द्वारा किए गए बाढ़ सुरक्षात्मक कार्य का सच उजागर किया। यह कार्य, जिस पर लाखों रुपये खर्च किए गए थे, महज एक से डेढ़ साल में ही जमींदोज होने गया।
यह खबर सोशल मीडिया पर आई और फिर वही सिलसिला दोहराया गया—दबाव, असहजता और फिर टकराव।22 मार्च 2026 को सिंचाई उपखंड पुरोला के सहायक अभियंता राम स्वरूप बड़ोनी द्वारा पत्रकारों को कार्यालय बुलाया गया। उम्मीद थी कि शायद इस बार सवालों के जवाब मिलेंगे, लेकिन जो हुआ वह और भी चिंताजनक था।
जैसे ही पत्रकार कार्यालय पहुंचे और बैठकर बातचीत शुरू ही की थी, तभी वही तथाकथित ठेकेदार यूनियन अध्यक्ष वहां आ धमका। आते ही उसने पत्रकारों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, गाली-गलौच की और यहां तक कि जान से मारने की धमकी भी दे डाली।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि यह सब एक सरकारी अधिकारी के सामने हो रहा था—और वह अधिकारी चुप रहा। न तो उसने उस व्यक्ति को रोका, न ही पत्रकारों की सुरक्षा की कोई कोशिश की।
यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह सिर्फ एक संयोग था?या फिर इसके पीछे कोई गहरी मिलीभगत है?
स्थानीय सूत्रों की मानें तो इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक प्रभावशाली राजनीतिक हस्ती का हाथ बताया जा रहा है, जो खुद को “विकास पुरुष” के रूप में प्रस्तुत करता है और क्षेत्र में बड़े-बड़े विकास कार्यों के दावे करता है।
लेकिन सवाल यह है कि अगर विकास के नाम पर भ्रष्टाचार हो रहा है, और उसे उजागर करने वालों को ही धमकाया जा रहा है—तो फिर यह विकास किसके लिए है?
यह कहानी सिर्फ पुरोला की नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम की कहानी है, जहां सच बोलना धीरे-धीरे जोखिम भरा काम बनता जा रहा है।
पत्रकार, जो समाज का आईना होते हैं, आज खुद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्हें खबर दिखाने से पहले सोचना पड़ता है—क्या इसके बाद कोई फोन आएगा? कोई धमकी मिलेगी? या फिर किसी झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाएगा?फिर भी, इन सबके बीच एक बात कायम है—पत्रकारिता का जज्बा।वो जज्बा जो सच को सामने लाने के लिए हर जोखिम उठाता है।वो मेहनत, जो पहाड़ों की दुर्गम राहों से होकर गुजरती है।वो हिम्मत, जो दबाव के बावजूद झुकती नहीं।
पुरोला के ये पत्रकार सिर्फ खबर नहीं लिख रहे, बल्कि एक लड़ाई लड़ रहे हैं—सच की, पारदर्शिता की और जनता के हक की।आज जरूरत है कि समाज इस लड़ाई को समझे और पत्रकारों के साथ खड़ा हो। क्योंकि अगर सच बोलने वालों की आवाज दबा दी गई, तो आने वाले समय में झूठ ही सच बन जाएगा।

Sapna Rani

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