DPC में छिपे राज? आरोपित IFS अधिकारी की पदोन्नति—स्वतंत्र जांच की जरूरत – पर्वतजन

लोक प्रशासन की नींव सत्यनिष्ठा और जवाबदेही पर टिकी होती है, लेकिन उत्तराखंड के वन विभाग से हाल ही में सामने आया एक मामला इन सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह मामला भारतीय वन सेवा (IFS) के एक अधिकारी की पदोन्नति से जुड़ा है, जिसे ‘पुरस्कार’ तब मिला जब उनके अपने ही विभाग के दो-दो प्रमुखों (HoFF) ने उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की संस्तुति की थी।
विद्युत गति से मिली पदोन्नति 31 दिसंबर, 2025 को उत्तराखंड शासन ने एक अधिसूचना जारी कर 2017 बैच के पांच अधिकारियों को 1 जनवरी, 2026 से जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में पदोन्नति प्रदान की। इस सूची में श्री कुंदन कुमार का नाम भी शामिल था। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पदोन्नति के लिए डीपीसी (DPC) की बैठक 30 दिसंबर को हुई और उसी दिन फाइल विभागीय मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुँच गई और उस पर हस्ताक्षर भी हो गए। 31 दिसंबर को आदेश जारी कर दिया गया, जबकि अधिकारी के विरुद्ध गंभीर कदाचार के आरोप विचाराधीन थे।
गंभीर आरोपों के घेरे में अधिकारी सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कुंदन कुमार पर अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 के उल्लंघन के कई गंभीर आरोप हैं:

1. बीज रेंज का बंद होना: हल्द्वानी की बीज रेंज, जिसे भारत की बेहतरीन बीज रेंज माना जाता है, कुंदन कुमार के कुप्रबंधन और कार्य शिथिलता के कारण बंद हो गई। उन पर डीसीएल (वन निक्षेप) मामलों में लापरवाही बरतने का आरोप है।
2. अनुशासनहीनता और उकसावा: उन पर आरोप है कि अनुसंधान वृत्त में पदस्थापना के दौरान उन्होंने कर्मियों को अपने ही वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध उकसाया, उन्हें हड़ताल पर जाने और शिकायत करने के लिए प्रेरित किया।
3. दस्तावेजों का अनधिकृत प्रसार: अधिकारी पर उच्चाधिकारियों के प्रति व्यक्तिगत द्वेष रखने और शासन की मर्यादा के विरुद्ध अनधिकृत दस्तावेजों के प्रसार का भी आरोप है।
ये आरोप-पत्र एक सामान्य शिकायत नहीं, बल्कि अखिल भारतीय सेवाओं में शून्य-सहिष्णुता की नीति का हिस्सा हैं। चार्जशीट जारी होना किसी अधिकारी के करियर पर एक स्थायी दाग की तरह होता है, जो जांच और संभावित दंड की शुरुआत करता है।
विभागीय प्रमुखों की अनदेखी इस प्रकरण का सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि वन विभाग के तत्कालीन प्रमुख डॉ. समीर सिन्हा ने 13 अक्टूबर, 2025 को ही अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की अनुशंसा की थी। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद वर्तमान प्रमुख (HoFF) आर.के. मिश्रा ने भी 30 दिसंबर, 2025 को इसी तरह की संस्तुति शासन को भेजी थी। इसके बावजूद, शासन ने विभाग प्रमुखों की इन गंभीर चेतावनियों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए अधिकारी को पदोन्नत कर दिया।
संस्थागत क्षरण का खतरा एक जागरूक नागरिक के नजरिए से देखें तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रियात्मक चूक नहीं है, बल्कि यह कमांड की श्रृंखला (Chain of Command) को कमजोर करने वाला कदम है। जब विभाग के सर्वोच्च तकनीकी और प्रशासनिक प्राधिकारी (HoFF) की अनुशंसा को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह विभाग की आत्म-नियमन की क्षमता को नष्ट कर देता है।
 
यह विरोधाभास प्रशासनिक प्रणाली के भीतर एक गहरी विसंगति को दर्शाता है, जहाँ एक ओर विभागाध्यक्ष ने श्री कुंदन कुमार के विरुद्ध विस्तृत जांच के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई की स्पष्ट अनुशंसा की है। और दूसरी ओर उन्हीं आरोपों के बीच अधिकारी को उच्च पद से नवाजा जा रहा है। सरकार को इस प्रकरण पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्या DPC बैठक में आरोपों पर विचार किया गया? क्या कोई जांच रिपोर्ट छिपाई गई? जनता को जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र जांच की जरूरत है। यदि सिद्धांतों से समझौता जारी रहा, तो यह न केवल वन विभाग, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे को कमजोर करेगा।
 
इस मामले में जब आईएफएस कुंदन कुमार से पर्वत जन ने बात की तो उनका कहना था कि अभी आधिकारिक रूप से उनको इस तरह कोई आरोप पत्र नहीं प्रेषित किया गया है।
जब तक कोई आधिकारिक पत्र नही मिलता, तब तक कुछ कहना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि उन पर लग रहे आरोपों का वह उचित माध्यम से जवाब देंगे और इस पर फाइनल निर्णय शासन को लेना है ।
शासन की जांच के बिना किसी को दोषी मान लेना सही नही है।
नाम का खुलासा न करते हुए उन्होंने कहा कि एक अधिकारी के खिलाफ उन्होंने दो करोड रुपए की वित्तीय अनियमितता की जांच की थी इसीलिए उनकी छवि को खराब किया जा रहा है।

Sapna Rani

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