देहरादून। मांडूवाला स्थित डॉल्फिन (पी.जी.) इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल एंड नेचुरल साइंसेज में आयोजित तीन दिवसीय ‘क्राफ्ट डेमोंस्ट्रेशन सह जागरूकता कार्यक्रम’ आज अपने दूसरे दिन में सफलतापूर्वक प्रवेश कर गया। यह कार्यक्रम विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से ऋषिकेश नेचुरल फाइबर हैंडीक्राफ्ट प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (RNHFPCL) द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
मुख्य अतिथि एवं संबोधनआज के सत्र का शुभारंभ मुख्य अतिथि गिरीश डोभाल (उपाध्यक्ष, प्रांतीय मधुमक्खी पालन परिषद) एवं अति विशिष्ट अतिथि आशीष डोभाल (वरिष्ठ पत्रकार एवं कम्युनिटी इन्फ्लुएंसर) द्वारा किया गया।
हस्तशिल्प क्षेत्र की स्थिरता पर विचार साझा करते हुए मुख्य अतिथि गिरीश डोभाल ने कहा
“यह कार्यक्रम कारीगरों को आवश्यक उद्यमशीलता कौशल (Entrepreneurial Skills) से लैस कर उनके लिए स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने की दिशा में एक प्रभावी कदम है। पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालना और उसे वैश्विक मंच प्रदान करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।”
अति विशिष्ट अतिथि आशीष डोभाल ने अपने संबोधन में स्थानीय कला के संरक्षण और डिजिटल युग में हस्तशिल्प की ब्रांडिंग के महत्व पर जोर दिया। इस अवसर पर कंपनी की निदेशक श्रीमती बीना पुंडीर ने भी कारीगरों का उत्साहवर्धन किया।
भीमल क्राफ्ट और प्राकृतिक फाइबर का सशक्तिकरण10 से 12 मार्च तक चलने वाले इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य उत्तराखंड के विलक्षण प्राकृतिक फाइबर (भीमल क्राफ्ट) को वैश्विक पहचान दिलाना है। कार्यक्रम में क्षेत्र के 20 दक्ष प्रतिभागी सम्मिलित हो रहे हैं, जिन्हें निम्नलिखित अनुभवी संसाधन व्यक्तियों (Resource Persons) द्वारा प्रशिक्षित किया जा रहा है:
श्रीमती विमला नेगी (हस्तशिल्प विशेषज्ञ)
श्रीमती विमला चौहान (हस्तशिल्प विशेषज्ञ)
श्रीमती बसंती रावत (हथकरघा एवं हस्तशिल्प)
श्रीमती ममता नेगी (हस्तशिल्प विशेषज्ञ)
कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएंइवेंट कोऑर्डिनेटर श्रीमती बीना पुंडीर (राज्य पुरस्कार विजेता) और निदेशक अनिल चंदोला के मार्गदर्शन में कार्यशाला के मुख्य आकर्षण रहे:
डिजाइन नवाचार: भीमल फाइबर से आधुनिक और उपयोगी उत्पाद बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण।
इंटरएक्टिव सत्र: उद्योग विशेषज्ञों के साथ बाजार की चुनौतियों और अवसरों पर सीधा संवाद।
सशक्तिकरण: भारत सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ दृष्टिकोण के अनुरूप स्थानीय शिल्पकारों को स्वरोजगार हेतु प्रेरित करना।
प्रबंधन और सहयोगकार्यक्रम के सफल संचालन में संस्थान के अपर निदेशक (प्रशासन) सुनील कौल, डीन अकादमिक प्रो. ज्ञानेंद्र अवस्थी, डीन रिसर्च प्रो. वर्षा पर्चा, और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सुधीर भारती का विशेष योगदान रहा। प्रबंधन टीम में डॉ. श्रुति शर्मा, विपुल गर्ग और डॉ. आशीष रतूड़ी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह पहल न केवल उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, बल्कि क्षेत्र की महिलाओं और युवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर है।
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