चमोली ( प्रदीप लखेड़ा )हिमालय की बेटी और आराध्य मां नंदा अपनी कैलाश यात्रा पर अब उन ऊंचाइयों की ओर बढ़ चली हैं, जहां प्रकृति भी जैसे मौन होकर उनकी अगवानी करती है। लोकजात यात्रा धीरे-धीरे आबादी वाले गांवों को पीछे छोड़कर उच्च हिमालय की निर्जन वादियों में प्रवेश कर रही है। गुरुवार को मां नंदा की जात “गेरौली पातल” में विश्राम करेगी। इसके बाद शुक्रवार को यात्रा पहुंचेगी उस पावन धरा वेदनी में जहां हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित “वेदनी कुंड” मां नंदा की लोकजात का सबसे महत्वपूर्ण और भावुक पड़ाव बन जाता है।समुद्र तल से 11,004 फीट की ऊंचाई पर स्थित वेदनी बुग्याल में शुक्रवार को पवित्र वेदनी कुंड में देवी-देवताओं के स्नान की परंपरा निभाई जाएगी। मान्यता है कि कैलाश जाते समय मां नंदा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध कर उसे इसी कुंड में डाल दिया था। यही कारण है कि वेदनी कुंड श्रद्धालुओं के लिए केवल एक जलकुंड नहीं, बल्कि मां नंदा की पौराणिक यात्रा और शक्ति का जीवंत प्रतीक है।वेदनी पहुंचकर मां नंदा की यात्रा जैसे प्रकृति और परमात्मा के और करीब पहुंच जाती है। मान्यता है कि यहां होने वाली पूजा-अर्चना के दौरान हिमालय के आराध्य भगवान शंकर स्वयं उपस्थित होते हैं। इस अद्भुत क्षण का साक्षी बनने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु कठिन और दुर्गम रास्तों को पार कर वेदनी पहुंचते हैं। वेदनी में पूजा-अर्चना के बाद मां नंदा अपने ननिहाल देवराड़ा लौटती हैं। लोकविश्वास में देवराड़ा मां नंदा का मायका है, जहां वह छह माह तक प्रवास करती हैं और उनकी विधिवत पूजा-अर्चना होती है। इसीलिए वेदनी से मां नंदा की वापसी का क्षण भी श्रद्धालुओं के लिए भावनाओं से भरा होता है।वेदनी बुग्याल की प्राकृतिक सुंदरता इस आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा कर देती है। चारों ओर फैले हरे-भरे बुग्याल, सामने दिखाई देती त्रिशूली और नंदा घुंघुटी की चोटियां और बीच में आस्था का केंद्र वेदनी कुंड—मानो पूरा हिमालय मां नंदा की विदाई का साक्षी बन रहा हो।वेदनी कुंड में मां नंदा की पूजा के साथ पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने की भी परंपरा है। वेदनी कुंड के पुजारी देवी दत्त कुनियाल बताते हैं कि यहां किए गए पितृ तर्पण को लेकर ऐसी मान्यता है कि वह सीधे पितृलोक तक पहुंचता है। यही वजह है कि लोकजात के साथ श्रद्धालु अपने देवी-देवताओं के साथ अपने पुरखों को भी श्रद्धा से याद करते हैं।उच्च हिमालय की इस निर्जन यात्रा से पहले वाण गांव मां नंदा की लोकजात का अंतिम आबाद पड़ाव है। वाण में मां नंदा के धर्मभाई लाटू देवता का मंदिर है। लोकमान्यता है कि मां नंदा ने लाटू को अपना धर्मभाई मानकर आगे की निर्जन और कठिन यात्रा की अगुवाई का दायित्व सौंपा था। तभी से वाण से आगे कैलाश की ओर बढ़ने वाली मां नंदा की लोकजात में लाटू देवता मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।समुद्र तल से 11,004 फीट की ऊंचाई पर स्थित वेदनी कुंड—जहां शुक्रवार को मां नंदा की लोकजात के दौरान देवी-देवताओं के पवित्र स्नान की परंपरा निभाई जाएगी। वेदनी में आस्था, प्रकृति और लोकविश्वास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
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