लो जी..अब जंगली जानवरों को भी शहर की हवा लग गई है। यूपी और उत्तराखंड के तेंदुए अब जंगल में रहने लायक नहीं रहे हैं। गन्ने के खेतों में पड़े-पड़े वो मोटे और आलसी होते जा रहे हैं। वन विभाग के मुताबिक अब ये जंगल के लिए अनफिट हो चुके हैं।
वन अधिकारियों के मुताबिक वापस जंगल में लौटने के लिहाज से ये अब बहुत ही ‘नाजुक’ हो गए हैं। ऐसे में जंगल में ये नहीं रह पाएंगे। इस वजह से इन्हें अब बस चिड़ियाघर ही भेजा जा रहा है। जंगल के शिकारी में हुए यह बदलाव लंबे समय से हो रहे परिवर्तन की वजह से हुआ है और यह इंसानों और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष को दिखाता है।
जंगल में छोड़ा लेकिन फिर गन्ने के खेतों में लौटेपिछले 4 साल में बिजनौर में 92 तेंदुओं को पकड़ा गया, जिनमें से 40 को जंगल में छोड़ने से रोक दिया गया है। उत्तराखंड राज्य वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 2021 से अब तक 96 तेंदुओं का रेस्क्यू किया गया। वन विभाग ने इन तेंदुओं के गले में रेडियो कॉलर लगाए और इन्हें राजाजी टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया था। फिर जो सच सामने आया, वो हैरान करने वाला था। 30 किलोमीटर से भी ज्यादा चलने के बाद ये तेंदुए वापस से गन्ने के खेतों में लौट आए।
गन्ने के खेत बने सुरक्षित ठिकानाबिजनौर से हरिद्वार तक की पूरी बेल्ट में गन्ना सिर्फ एक फसल ही साबित नहीं हो रही है बल्कि तेंदुओं के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है। तेंदुओं के पंजे के निशान पहले जंगल के किनारे ही दिखाई देते थे, फिर झाड़ियों में दिखने लगे और अब खेतों के अंदर गहराई तक इनके पंजों के निशान दिखने लगे हैं।
मोटे हुए..पंजे कुंद हुए, दांत तक घिसेवन अधिकारियों का कहना है कि कई तेंदुए अब स्वभाव से जंगली नहीं रहे। इनकी कमर मोटी हो गई है। पंजे कुंद पड़ गए हैं। यहां तक कि शिकार को ठीक से पकड़ भी नहीं पाते। गन्ने के खेतों में पड़े रहने की वजह से वे नाजुक बन गए हैं। बिना शिकार किए ही इनको भोजन मिल जा रहा है। वनकर्मी अब इसे एक ऐसा संकट कहने लगे हैं जो अब अस्थायी नहीं लगता। बिजनौर में, पिछले एक साल में पकड़े गए चार बड़े तेंदुओं के दांत इतने घिस चुके थे कि वे अब जंगल में शिकार को काट या पकड़ नहीं सकते थे।
बाघों की वजह से गन्ने के खेतों में हुए शिफ्टराजाजी और अमानगढ़ में बाघों की आबादी बढ़ रही है। अमानगढ़ में जहां कभी 12 बाघ थे अब बढ़कर 34 हो गए हैं। अपना क्षेत्र बढ़ाने के लिए बाघों ने तेंदुओं को खेतों की ओर धकेल दिया। गन्ने के खेतों में तेंदुओं को शिकार करने के लिए ज्यादा भागदौड़ भी नहीं करनी होती। बस आराम से बैठकर इंसानों या पालतू जानवर का अपने पास आने का इंतजार करना होता है। एक 10 साल के नर तेंदुए ने यहां 4 लोगों को मार दिया था। इस तेंदुए का वजन 85 किलो था, जो बहुत ही ज्यादा है। यह पालतू जानवर और बच्चों पर हमला कर के ही खुद को जिंदा रखे हुए था।
अब जंगल नहीं जाना चाहते तेंदुएबिजनौर के रिटायर्ड DFO सलील शुक्ला कहते हैं कि एक बार जब तेंदुओं को गन्ने के खेत के रूप में अपने नए आवास को आसानी से जान लेते हैं तो वो इसे ही चुनते हैं। आप इन्हें जंगल में छोड़ देंगे तो फिर से लौट आएंगे। ये नाजुक हो चुके हैं। इनका पेट गोल, कंधे भारी हो चुके हैं और यह शिकार करने की वजह से नहीं बल्कि पक्की सड़क पर सालों तक चलने से घिसने की वजह से चिकने हुए हैं। उनकी चालाकी भी कम हो गई है। इन्हें जब भूख लगती है तो ये जंगल की ओर नहीं बल्कि पास के गांव की ओर भागते हैं।
बिजनौर में 35 लोगों की मौतइस वजह से इंसानों पर तेंदुए के हमले के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। पहले इस तरह की घटनाएं गन्ने की कटाई के दौरान होती थी, लेकिन अब यह आम हो चुका है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2023 से, बिजनौर जिले में तेंदुए के हमलों में 35 लोग मारे गए हैं। इनमें से कई पर तो उनके घर से कुछ मीटर की दूरी पर ही हमला हुआ था।
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