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उत्तराखंड में दिलचस्प होगा 2027 का चुनाव, BJP हैट्रिक की राह पर तो कांग्रेस का कई सीटों पर संघर्ष – myuttarakhandnews.com

उत्तराखंड की राजनीति 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. 2022 के चुनावी नतीजों और उसके बाद हुए उपचुनावों ने साफ संकेत दे दिए हैं कि मुकाबला भले ही दिलचस्प हो, लेकिन बढ़त अभी भी सत्तारूढ़ दल के पास है. पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहां सत्ता की हैट्रिक की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस कई सीटों पर अपनी पकड़ बचाने की चुनौती से जूझती दिख रही है.
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी. यह उत्तराखंड के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी दल ने लगातार सत्ता दोहराई. मौजूदा स्थिति में भी भाजपा का संगठनात्मक ढांचा, संसाधन और नेतृत्व उसे बढ़त दिलाते हैं.
भाजपा अभी भी मजबूतगढ़वाल और कुमाऊं के कई हिस्सों में भाजपा ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. रायपुर, डोईवाला, कालाढूंगी, रुद्रपुर और काशीपुर जैसी सीटों पर भारी जीत इसका प्रमाण हैं. इसके अलावा धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों पर पार्टी की पकड़ केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे क्षेत्रों में भी दिखाई दी है. मुख्यमंत्री धामी की छवि, केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन और विकास कार्यों का प्रचार भाजपा के लिए बड़े प्लस पॉइंट हैं. चम्पावत उपचुनाव में 55 हजार से ज्यादा वोटों से मिली जीत ने यह भी दिखाया कि पार्टी चुनावी मशीनरी को प्रभावी ढंग से संचालित करना जानती है.
कांग्रेस की कमजोर कड़ियांकांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी अस्थिर पकड़ है. कई सीटों पर पार्टी बेहद कम अंतर से जीती. अल्मोड़ा (127 वोट), द्वाराहाट (182 वोट),ये परिणाम बताते हैं कि जमीनी स्तर पर संगठन कमजोर है और जीत टिकाऊ नहीं मानी जा सकती. तराई और हरिद्वार क्षेत्र में जरूर कांग्रेस को कुछ सीटें मिलीं, लेकिन यहां भी उसे कड़ी टक्कर मिली. कई जगहों पर भाजपा से सीधी लड़ाई में कांग्रेस पिछड़ी, जबकि कुछ सीटों पर तीसरे दलों ने भी उसका गणित बिगाड़ा.
इसके अलावा नेतृत्व का अभाव, स्पष्ट रणनीति की कमी और स्थानीय मुद्दों को राज्यव्यापी एजेंडा बनाने में असफलता कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रही है. उपचुनावों में मिली कुछ जीतें भी स्थायी राजनीतिक बढ़त में तब्दील होती नहीं दिख रहीं.
तीसरा मोर्चा बिगाड़ सकता है खेलउत्तराखंड क्रांति दल (UKD) और आम आदमी पार्टी (AAP) 2027 के चुनाव में ‘गेम चेंजर’ बन सकते हैं. UKD ‘मूल निवास’ और ‘भू-कानून’ जैसे मुद्दों को हवा देकर खासकर पहाड़ी सीटों पर असर डाल सकता है. वहीं AAP शहरी और तराई क्षेत्रों में कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ये दल भले ही बड़ी जीत दर्ज न करें, लेकिन वोट काटकर सीधे मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं. जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है.
एंटी-इंकम्बेंसी को कम करना- नए चेहरे और 25-30% टिकट बदलाव की रणनीति.युवाओं को साधना-रोजगार, पेपर लीक जैसे मुद्दों पर ठोस कदम.स्थानीय मुद्दों पर फोकस-पलायन, भू-कानून और क्षेत्रीय असंतोष को संबोधित करना.मुख्यमंत्री धामी का युवा चेहरा और आक्रामक चुनावी शैली भाजपा के लिए बड़ा हथियार बन सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होने वाला है. सीएम धामी युवाओं की पहली पसंद है. वहीं लगातार धर्म के स्थानीय मुद्दों को उठाने के चलते उनकी पकड़ लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत हुई है. जब लैंड जिहाद सख्त नकल कानून मदरसा बोर्ड भंग जैसे फैसले सीएम धामी की छवि को उत्तराखंड में ही नहीं देश में छाई हुई है,जिसका फायदा बीजेपी को 2027 विधान सभा चुनाव में मिलेगा.
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि रणनीति और धारणा का होगा. भाजपा जहां मजबूत संगठन और नेतृत्व के दम पर हैट्रिक की ओर बढ़ती दिख रही है, वहीं कांग्रेस कई सीटों पर अपनी स्थिति बचाने की चुनौती में उलझी है. अगर भाजपा एंटी-इंकम्बेंसी को नियंत्रित कर पाई और तीसरे मोर्चे का वोट विभाजन जारी रहा, तो राज्य में सत्ता की हैट्रिक का रास्ता उसके लिए बेहद आसान है.
 

Nandni sharma

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