स्टोरी(कमल जगाती, नैनीताल):-
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आयुर्वेद विश्वविद्यालय के शिक्षकों को एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वेतन व अन्य लाभ नहीं दिये जाने संबंधी मामले में सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय को निर्देश दिए हैं कि इनको अन्य कर्मचारियों की भांति हर महीने वेतन का भुगतान करें। क्योंकि इनके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं है और न ही कोई वसूली का आदेश है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि चाहे तो विश्वविद्यालय इनके दस्तावेजो की जांच करा सकता है। इसके साथ ही आयुर्वेद शिक्षक वेल्फेयर संघ की याचिका को निस्तारित कर दिया गया है।
याचिका में अदालत को बताया गया कि विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की 9 दिसंबर 2025 को हुई बैठक में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था। इस बैठक में तय किया गया कि कैरियर एडवांस स्कीम के तहत पूर्व में दिए गए लाभों और वसूलियों के अंतिम समाधान तक, अंतरिम व्यवस्था के तौर पर शिक्षकों के 6 महीने के बकाया वेतन का भुगतान कर दिया जाएगा।
विश्वविद्यालय का कहना है कि शासन से बजट न मिलने के कारण इस फैसले को अब तक लागू नहीं किया जा सका है।
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एसोसिएशन की ओर से बताया गया कि शिक्षक पिछले कई महीनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं। नियमित रूप से अपनी सेवाएं देने के बावजूद भुगतान न होने से शिक्षकों के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। न्यायालय ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जब शिक्षक अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं, तो उनका वेतन रोकना न्यायसंगत नहीं है ।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वित्त सचिव, जो कार्यकारी परिषद के सदस्य भी हैं, ने कैरियर एडवांस स्कीम का लाभ देने पर कुछ आपत्तियां दर्ज कराई थीं जिन्हें कार्यपरिषद ने नजरअंदाज कर दिया।
लेकिन न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि चूंकि कार्यकारी परिषद पहले ही एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर निर्णय ले चुकी है, इसलिए राज्य सरकार को वर्तमान वेतन और बकाया राशि रोकने का कोई अधिकार नहीं। पक्षो की सुनवाई के बाद न्यायालय ने उन्हें अन्य कर्मचारियों की भांति हर महीने वेतन देने को कहा है।
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