सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा की ओर से आयोजित प्री-पीएचडी प्रवेश परीक्षा मामले में सुनवाई, जहर खिलाने के आरोप में घिरे परिवार को भी राहत
नैनीताल: अल्मोड़ा स्थित सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित प्री-पीएचडी प्रवेश परीक्षा का मामला नैनीताल हाईकोर्ट पहुंच गया है. जिसमें याचिकाकर्ता दीपक चंद्र उप्रेती ने परीक्षा में यूजीसी रेगुलेशन 2020 का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है.
याचिका में उनकी ओर से कहा गया है कि यूजीसी रेगुलेशन 2020 के अनुसार प्री-पीएचडी परीक्षा में 50 फीसदी प्रश्न संबंधित विषय और 50 फीसदी प्रश्न रिसर्च मेथोडोलॉजी से पूछे जाने अनिवार्य हैं. विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित परीक्षा में सभी प्रश्न केवल इतिहास विषय से ही पूछ लिए गए. रिसर्च मेथोडोलॉजी से एक भी प्रश्न नहीं पूछा गया. इतिहास विषय के अभ्यर्थी की ओर से इस मामले को चुनौती दी गई है.
अदालत ने विवि से पूछा है कि अगर परीक्षा आयोजित कराने में यूजीसी रेगुलेशन का उल्लंघन हुआ है, तो क्या विश्वविद्यालय दोबारा परीक्षा करा सकती है? इस मामले में 3 सितंबर तक स्थिति से संबंधित विभाग अवगत कराएं. अगली सुनवाई 3 सितंबर को होगी. आज मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई.
जहर खिलाने के आरोप में घिरे परिवार को हाईकोर्ट से राहत, गिरफ्तारी पर लगी रोक: हरिद्वार जिले के रुड़की कोतवाली में दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हुई. मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत दी है.
मामले में पीड़िता ने अपने पति जाबिर, उसकी पहली पत्नी और उनके बेटे पर 14 अगस्त 2026 को जबरन कीटनाशक खिलाने का आरोप लगाया था. जिसके तहत भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 123 और 61(2) के तहत मुकदमा दर्ज कराया था.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पारिवारिक विवाद के चलते उन्हें झूठा फंसाया गया है. जबकि, पति ने दोनों पत्नियों के रहने के लिए अलग-अलग व्यवस्था कर रखी है. याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष घटना वाले दिन की सीसीटीवी फुटेज का हवाला दिया.
वकील ने बताया कि कथित घटना रात 10 बजे की बताई गई है. जबकि, रात 11 बजे पीड़िता अपनी बेटी के साथ घर के दरवाजे पर ताला लगाकर स्कूटी से आराम से जाती हुई दिख रही है. फुटेज से साफ है कि पीड़िता घटना के समय के बाद भी पूरी तरह सामान्य और होश में थी.
नैनीताल हाईकोर्ट ने मामले को स्वीकार करते हुए प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 4 हफ्ते का समय दिया है. साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक पुलिस जांच जारी रहेगी, लेकिन याचिकाकर्ता यदि जांच में सहयोग करते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.
कब्रिस्तान के लिए आरक्षित भूमि मामले में सुनवाई: नैनीताल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने उधम सिंह नगर जिले की तहसील रुद्रपुर स्थित ‘कब्रिस्तान कमेटी भगवानपुर’ की ओर से दायर रिट याचिका का निपटारा कर दिया है.
याचिकाकर्ता कमेटी ने जिला उप निदेशक चकबंदी/कलेक्टर और चकबंदी अधिकारी किच्छा के पुराने आदेशों को चुनौती दी थी. याचिका में गुहार लगाई गई थी कि 20 नवंबर 1997 के आदेश के तहत कब्रिस्तान/कब्रगाह के लिए आरक्षित भूमि में कोई हस्तक्षेप न किया जाए और उसे मूल आवंटित प्लॉट के रूप में बहाल किया जाए.
वहीं, सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने किच्छा के चकबंदी अधिकारी से प्राप्त लिखित निर्देशों और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (भारत सरकार) की 4 जुलाई 2014 की अधिसूचना को अदालत में पेश किया.
राज्य सरकार ने बताया कि याचिकाकर्ता को आवंटित भूमि का अधिग्रहण केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के लिए 2014 में ही कर लिया गया था. चूंकि यह भूमि सार्वजनिक उपयोग/सार्वजनिक उपयोगिता की श्रेणी में आती है और राज्य सरकार की है, इसलिए याचिकाकर्ता को इसका कोई मुआवजा नहीं दिया गया.
इसके जवाब में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कब्रिस्तान के लिए वैकल्पिक भूमि आवंटित की जानी चाहिए. इस पर राज्य की ओर से कहा गया कि इसके लिए याचिकाकर्ता सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना पक्ष/प्रार्थना पत्र रख सकते हैं.
हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को दो हफ्ते के भीतर संबंधित जिलाधिकारी/उप निदेशक चकबंदी के समक्ष अभ्यावेदन पेश करने की स्वतंत्रता दी है. अदालत ने निर्देश दिया कि नियत समय में आवेदन मिलने पर कानून के अनुसार 8 महीने के भीतर उस पर निर्णय लिया जाए.
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