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जहां थी बर्फ, वहां बह रहा पसीना, धीरे-धीरे मर रही हिमालय की आत्मा, मौसम पर चिंता पैदा करती है यह रिपोर्ट – myuttarakhandnews.com

देहरादून : पहाड़ों के मौसम को लेकर आई ये खबर चिंता पैदा करती है. उत्तराखंड और लद्दाख जैसे ऊंचे पहाड़ी इलाके, जिन्‍हें अब तक गर्मी से सुरक्षित माना जाता था, वहां अब मौसम गर्म होता जा रहा है. क्लाइमेट ट्रेंड्स और क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स की नई स्टडी ने एक ऐसा सच सामने रखा है, जिसने वैज्ञानिकों, प्रशासन और स्थानीय समुदायों तक को चिंता में डाल दिया है. रिपोर्ट कहती है कि 2023 तक उत्तराखंड में एक भी हीटवेव दिन नहीं था, लेकिन 2024 में यह संख्या 25 दिन पर पहुंच गई. लद्दाख में औसत गर्म तापमान में 9.1% की वृद्धि दर्ज की गई है.
परेशान करने वाली बात ये है कि देश की क्लाइमेट शील्ड हिमालय अब मैदानी राज्यों की तरह ही हीट स्ट्रेस जोन में आ रहा है. स्टडी में पाया गया कि उत्तराखंड में गर्मियों के औसत तापमान में 11.2 प्रतिशत की चिंताजनक तेजी हुई, जो सभी हिमालयी राज्यों में सबसे ज्‍यादा है. वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बदलाव उस नैचुरल बफर के टूटने का संकेत है जो सदियों से इन पहाड़ी इलाकों को चरम गर्मी से बचाता रहा.
इस खतरे के कई असर सामने आए हैं..1. हीटवेव से अस्पतालों पर दबाव बढ़ा.2. ऊंचाई वाले इलाकों में पानी का स्तर गिरा.3. एयर कंडीशनिंग और कूलिंग की मांग बढ़ी.4. बिजली की मां रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची.
TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स के CEO मनीष राम कहते हैं कि गर्मी बढ़ने से कूलिंग की मांग बढ़ती है. फॉसिल फ्यूल की खपत बढ़ती है और इससे गर्मी और बढ़ती है. यह एक खतरनाक हीट पावर ट्रैप है, जिसे तुरंत तोड़ना ज़रूरी है.
2024 भारत के लिए सिर्फ गर्म नहीं, ऐतिहासिक रूप से गर्म साल रहा. IMD और CSE दोनों ने पुष्टि की है कि यह रिकॉर्ड पर सबसे गर्म सालों में से एक है. 2024 में भारत पर हीटवेव का प्रभाव काफी ज्‍यादा रहा. मार्च से जून के बीच 200 से ज्‍यादा हीटवेव दिन थे. अप्रैल-जून में 9 प्रतिशत अधिक बिजली की मांग रही. सिर्फ 3 महीनों में 327 मिलियन टन कार्बन डाइयाक्साइड उत्सर्जन रहा. पिछले दशक में गर्मियों की वजह से 2.5 गीगाटन फॉसिल एमिशन हुआ.
इससे साफ है कि जितनी ज्‍यादा गर्मी, उतनी ज्‍यादा बिजली की डिमांड रही. यानि उतना ज्‍यादा प्रदूषण भी हुआ और जितना प्रदूषण, उतनी ज्‍यादा गर्मी. यानी भारत हीट पावर साइकिल में फंसता जा रहा है.
उत्तराखंड और लद्दाख जैसे इलाके, जहां कभी 40 डिग्री सेल्यियस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, अब लगातार हीटवेव झेल रहे हैं. यह सिर्फ तापमान का मामला नहीं बल्कि पानी, बिजली, कृषि, पर्यटन, स्वास्थ्य और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर डाल रहा है. रिपोर्ट में कहा गया कि हीटवेव का खतरा बढ़ने के बावजूद भारत में सिर्फ 4 राज्य, 3 शहर और 1 जिला ही ऐसे हैं जिनके हीट एक्शन प्लान में रिन्यूएबल कूलिंग सिस्टम शामिल हैं. यानी देश का अधिकांश हिस्सा अभी भी गर्मी के नए दौर के लिए तैयार नहीं है.
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला कहती हैं कि हीटवेव और बिजली की कमी अब दोहरी मार बन चुके हैं. बिना मजबूत ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और क्लाइमेट रेजिलिएंट सिस्टम के हर गर्मी देश को और कमजोर कर देगी. भारत ने पिछले 10 साल में रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता 84 GW से बढ़ाकर 209 GW कर दी. लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि गर्मियों के दौरान पीक मांग में फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है.
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर बैटरी स्टोरेज, स्मार्ट ग्रिड और डिमांड मैनेजमेंट में निवेश नहीं बढ़ा, तो भारत का क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन गर्मी की इस रफ्तार में धीमा पड़ जाएगा.

Nandni sharma

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